Class 9th Sanskrit Shemushi Chapter 4 full Solution NCERT || कक्षा 9वीं संस्कृत चतुर्थ पाठ: सूक्तिमौक्तिकम् सॉल्यूशन
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चतुर्थः पाठः — सूक्तिमौक्तिकम्
कक्षा – नवमी (9वीं) | विषय – संस्कृतम् (शेमुषी भाग-1)
★ सम्पूर्ण अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि एवं परीक्षापयोगी नोट्स ★
📖 पाठ-सार / परिचयः
प्रस्तुत पाठ में विविध नीति-ग्रन्थों (जैसे— मनुस्मृति, विदुरनीति, चाणक्यनीति, मृच्छकटिकम्, नीतिशतकम्, भामिनीविलास एवं हितोपदेश) से श्रेष्ठ नीतिपरक श्लोकों का संग्रह किया गया है। इसमें सदाचार का महत्त्व, मीठी वाणी की उपयोगिता, परोपकारी स्वभाव, सज्जन-दुर्जन की मित्रता का भेद तथा गुणों की महिमा का प्रतिपादन किया गया है।
प्रस्तुत पाठ में विविध नीति-ग्रन्थों (जैसे— मनुस्मृति, विदुरनीति, चाणक्यनीति, मृच्छकटिकम्, नीतिशतकम्, भामिनीविलास एवं हितोपदेश) से श्रेष्ठ नीतिपरक श्लोकों का संग्रह किया गया है। इसमें सदाचार का महत्त्व, मीठी वाणी की उपयोगिता, परोपकारी स्वभाव, सज्जन-दुर्जन की मित्रता का भेद तथा गुणों की महिमा का प्रतिपादन किया गया है।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)—
(क) वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति? (धन नष्ट होने पर मनुष्य कैसा रहता है?)
उत्तरम् — अक्षीणः (अनष्ट / धनहीन होने पर भी चरित्रवान रहता है)
(ख) कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्? (किसके प्रतिकूल कार्य दूसरों के साथ न करें?)
उत्तरम् — आत्मनः (स्वयं के प्रतिकूल)
(ग) कुत्र दरिद्रता न भवेत् / न कर्तव्या? (कहाँ दरिद्रता नहीं होनी चाहिए?)
उत्तरम् — वचने (प्रिय और मधुर बोलने में)
(घ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति? (पेड़ स्वयं क्या नहीं खाते हैं?)
उत्तरम् — फलानि (फलों को)
(ङ) पुरा लघ्वी पश्चात् च वृद्धिमती का भवति? (पहले छोटी और बाद में बढ़ने वाली क्या होती है?)
उत्तरम् — सज्जनानां मैत्री (सज्जनों की मित्रता)
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर)—
(क) यत्नेन किं रक्षितव्यम्, वित्तं वृत्तं वा?
उत्तरम् — यत्नेन वृत्तम् (चरित्रम्) रक्षितव्यम्। वित्तं तु एति याति च।
(ख) अस्माभिः किं न समाचरितव्यम्? (हमें कैसा आचरण दूसरों के प्रति नहीं करना चाहिए?)
उत्तरम् — यत् आचरणम् आत्मनः प्रतिकूलं स्यात्, तत् आचरणं परेषां न समाचरितव्यम्।
(ग) जन्तवः केन विधिना तुष्यन्ति? (समस्त प्राणी किससे प्रसन्न होते हैं?)
उत्तरम् — सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन (मधुरवचनेन) तुष्यन्ति।
(घ) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति? (सज्जनों की मित्रता कैसी होती है?)
उत्तरम् — सज्जनानां मैत्री दिनस्य परार्धच्छाया इव आरम्भे लघ्वी पश्चात् च वृद्धिमती भवति।
(ङ) सरोवराणां हानिः कदा भवति? (सरोवरों की हानि कब होती है?)
उत्तरम् — यदा हंसानां सरोवरेभ्यः विप्रयोगः (वियोगः) भवति, तदा सरोवराणां हानिः भवति।
(च) नद्यः जलं कदा अपेयं भवति? (नदियों का जल कब पीने योग्य नहीं रहता?)
उत्तरम् — समुद्रम् आसाद्य (समुद्रे मिलित्वा) नद्यः अपेयाः भवन्ति।
प्रश्न 3. 'क' स्तम्भे विशेषणानि 'ख' स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत—
| 'क' स्तम्भः (विशेषणानि) | 'ख' स्तम्भः (विशेष्याणि / शुद्ध मेलनम्) |
|---|---|
| (क) आस्वाद्यतोयाः | नद्यः |
| (ख) गुणयुक्तः | दरिद्रः |
| (ग) दिनस्य पूर्वार्धभिन्ना | खलानां मैत्री |
| (घ) दिनस्य परार्धभिन्ना | सज्जनानां मैत्री |
प्रश्न 4. अधोलिखितयोः श्लोकयोः आशयं हिन्दीभाषया लिखत (श्लोकार्थ)—
(क) "आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥"
दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥"
भावार्थ — दुर्जनों की मित्रता दोपहर से पहले की छाया की तरह पहले बहुत बड़ी और धीरे-धीरे घटने वाली होती है। जबकि सज्जनों की मित्रता दोपहर के बाद की छाया की तरह पहले छोटी और बाद में निरंतर बढ़ने वाली होती है।
(ख) "प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥"
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥"
भावार्थ — मधुर और प्रिय वाणी बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। अतः हमें सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिए; बोलने में भला कैसी कंगाली (कंजूसी)।
प्रश्न 5. अधोलिखित-स्थूलपदान्याधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण)—
(क) वृत्ततः क्षीणः हतः भवति।
प्रश्नम् — कस्मात् क्षीणः हतः भवति?
(ख) धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।
प्रश्नम् — किम् श्रुत्वा अवधार्यताम्?
(ग) वृक्षाः फलं न खादन्ति।
प्रश्नम् — के फलं न खादन्ति?
(घ) खलानां मैत्री आरम्भगुर्वी भवति।
प्रश्नम् — केषाम् मैत्री आरम्भगुर्वी भवति?
प्रश्न 6. भिन्नप्रकृतिकं पदं चिनुत (भिन्न पद चुनकर लिखिए)—
(क) वक्तव्यम्, कर्तव्यम्, सर्वस्वम्, हन्तव्यम्।
भिन्नपदम् — सर्वस्वम् (शेष सभी तव्यत्-प्रत्ययान्त पदानि सन्ति)
(ख) यत्नेन, वचने, प्रियेण, मरालेन।
भिन्नपदम् — वचने (सप्तमी विभक्तिः, शेषाः तृतीया विभक्तौ सन्ति)
(ग) श्रूयताम्, अवधार्यताम्, धनवताम्, क्षम्यताम्।
भिन्नपदम् — धनवताम् (संज्ञापदम्, शेषाः क्रियापदानि सन्ति)
(घ) परितः, पुरतः, नद्यः, सर्वतः।
भिन्नपदम् — नद्यः (संज्ञापदम्, शेषाः अव्ययपदानि सन्ति)
★ अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दवः (सन्धि एवं समास) ★
1. प्रमुख सन्धि-विच्छेदः —
• श्रुत्वा चैव = श्रुत्वा + च + एव (वृद्धि सन्धि)
• न + अम्भः = नाम्भः (दीर्घ सन्धि)
• समुद्रम् + आसाद्य = समुद्रमासाद्य (व्यञ्जन सन्धि)
• गुणी + अपि = गुण्यपि (यण् सन्धि)
• न + अम्भः = नाम्भः (दीर्घ सन्धि)
• समुद्रम् + आसाद्य = समुद्रमासाद्य (व्यञ्जन सन्धि)
• गुणी + अपि = गुण्यपि (यण् सन्धि)
2. समास-विग्रहः —
• धर्मसर्वस्वम् = धर्मस्य सर्वस्वम् (षष्ठी तत्पुरुष समास)
• प्रियवाक्यम् = प्रियं च तत् वाक्यम् (कर्मधारय समास)
• खलसज्जनानाम् = खलाः च सज्जनाः च तेषाम् (द्वन्द्व समास)
• प्रियवाक्यम् = प्रियं च तत् वाक्यम् (कर्मधारय समास)
• खलसज्जनानाम् = खलाः च सज्जनाः च तेषाम् (द्वन्द्व समास)
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