Class 10th English Practice Set Paper 2026-27 MPboard. कक्षा 10वीं विषय अंग्रेजी मॉडल सेट पेपर MP Board
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Sample Question Paper for Practice only
Higher Secondary Examination-2026
विषय - हिन्दी Subject - Hindi
| Total Question | Total Printed Pages | Time | Maximum Marks |
| 23 | 5 | 3 hours | 80 |
| स्तम्भ (अ) | स्तम्भ (ब) |
|---|---|
| i 'कबीर सम्मान' | (क) प्रयोगवाद |
| ii नये बिम्ब, नये प्रतीक | (ख) शमशेरबहादुर सिंह |
| iii स्मृति की रेखाएँ | (ग) अनुभाव |
| iv आश्रय की बाह्य शारीरिक चेष्टाएँ | (घ) भक्तिन |
| v शुभकामनाएँ, आशीर्वाद | (च) शब्दों का स्थायित्व |
| vi मुद्रित माध्यमों की विशेषता | (छ) लक्ष्मी - नारायण |
| vii. अशोक के फूल | (ज) इच्छावाचक वाक्य |
कई लोग समझते हैं कि अनुशासन और स्वतंत्रता में विरोध है, किन्तु वास्तव में यह भ्रम है। अनुशासन द्वारा स्वतंत्रता नहीं छीनी जाती, बल्कि दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा होती है। सड़क पर चलने के लिये हम स्वतंत्र हैं। हमें बाईं तरफ से चलना चाहिए, किंतु चाहें तो बीच में भी चल सकते हैं। इससे हम अपने प्राण तो संकट में डालते हैं, दूसरों की स्वतंत्रता भी छीनते हैं। विद्यार्थी भारत के भावी-राष्ट्र निर्माता हैं। उन्हें अनुशासन के गुणों का अभ्यास अभी से करना चाहिए जिससे वे भारत के सच्चे सपूत कहला सकें।
कल जो हमारी सभ्यता पर थे हँसे अज्ञान से,
वे आज लज्जित हो रहे हैं अधिक अनुसंधान से।
जो आज प्रेमी हैं हमारे भक्त कल होंगे वही,
जो आज व्यर्थ विरक्त हैं अनुरक्त कल होंगे वही।
सब देश विद्या प्राप्ति को सतत यहां आते रहे,
सुरलोक में भी गीत ऐसे देव-गण गाते रहे-
"हैं धन्य भारतवर्षवासी धन्य भारत वर्ष है,
सुरलोक से भी सर्वथा उसका अधिक उत्कर्ष है" ।।
मैं और, और जग और कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता !
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ ।।
तुलसी सारनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोंको एकु न दैबको दोऊ ।।
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु ये दोनों ही जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी- 'धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना !'
उस बल को नाम जो दो, पर वह निश्चय उस स्थल की वस्तु नहीं है जहां पर संसारी वैभव फलता-फूलता है। वह कुछ अपर जाति का तत्त्व है। लोग रिस्परिचुअल कहते हैं, आत्मिक, धार्मिक, नैतिक कहते हैं। मुझे योग्यता नहीं कि मैं उन शब्दों में अंतर देखूँ और प्रतिपादन करूँ। मुझे शब्द से सरोकार नहीं। मैं विद्वान नहीं कि शब्दों पर अटकूं। लेकिन इतना तो है कि जहां तृष्णा है, बटोर रखने की स्पृहा है, वहां उस बल का बीज नहीं है। बल्कि यदि इस बल को सच्चा मानकर बात की जाए तो कहना होगा कि संचय की तृष्णा और वैभव की चाह में व्यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है। निर्बल ही धन की ओर झुकता है। वह अबलता है।
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