Class 10th आत्मकथ्य - जयशंकर प्रसाद (PDF Version)
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Class 10th आत्मकथ्य – जयशंकर प्रसाद
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
1. संदर्भ – प्रस्तुत पद्यांश कक्षा दसवीं हिंदी क्षितिज भाग 2 के पाठ आत्मकथ्य से लिया गया है इसके कवि जयशंकर प्रसाद हैं।
2. प्रसंग – कवि आत्मकथा न लिखने के कारणों को बताते हुए जीवन की नश्वरता, दूसरों द्वारा किए जाने वाले उपहास और अपनी असफलताओं को छिपाने की बात कहते हैं।
3. भावार्थ – भंवरा गूँज-गूँज कर न जाने अपने जीवन की कौन-सी अनकही कहानी कह रहा है। देखो, आज कितनी सारी घनी पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं, जो जीवन की नश्वरता और दुखों को दिखाती हैं। इस अथाह, गंभीर और अंतहीन नीले आकाश के नीचे न जाने कितने लोगों के जीवन का इतिहास मौजूद हैं। और इन आत्मकथाओं को पढ़कर लोग एक-दूसरे पर गंदा, कड़वा और व्यंग्यात्मक मज़ाक उड़ाते ही रहते हैं। हे मित्रो! इतना सब जानने के बावजूद क्या तुम चाहते हो कि मैं अपनी बीती हुई कमज़ोरियों और असफलताओं को लिख डालूँ? क्या तुम यह जानकर खुश होगे जब देखोगे कि मेरे जीवन का यह घड़ा पूरी तरह से खाली है? लेकिन, मुझे यह डर है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी कहानी पढ़कर तुम्हें लगे कि तुमने ही मेरे जीवन का सारा रस निचोड़ लिया है। और कहीं तुम खुद को ही मेरा सुख-रस लेकर अपने जीवन रूपी घड़े को भरने वाला समझने लगो।
यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
1. संदर्भ – प्रस्तुत पद्यांश कक्षा दसवीं हिंदी क्षितिज भाग 2 के पाठ आत्मकथ्य से लिया गया है इसके कवि जयशंकर प्रसाद हैं।
2. प्रसंग – कवि अपनी आत्मकथा में अपनी भूलों या छलावों को उजागर करने में संकोच करते हैं। वे अपने प्रेम के सुखद पलों और उन्हें खो देने की व्यथा का उल्लेख करते हैं।
3. भावार्थ – यह कैसी विडंबना है! हे मेरी भोली आत्मा! क्या मैं अपनी ही सरलता का जग में मज़ाक बनवाऊँ? क्या मैं आत्मकथा में अपनी ही की गई गलतियाँ गिनाऊँ या दूसरों द्वारा मेरे साथ किए गए धोखे और छल को सबको दिखलाऊँ? मैं उन मधुर चाँदनी रातों की पवित्र और उज्ज्वल प्रेम-कहानी को भला जग को कैसे सुनाऊँ? और उन खुशी के पलों की बातें, जो खिलखिला कर हँसते हुए बिताई थीं, मैं पूरी दुनिया को कैसे बताऊँ? मुझे वह पूर्ण सुख कभी नहीं मिला, जिसका सपना देखते-देखते मैं जाग गया था। वह सुख मेरे पास आकर गले लगने ही वाला था कि अचानक मुस्कुराकर मुझसे दूर भाग गया।
जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
1. संदर्भ – प्रस्तुत पद्यांश कक्षा दसवीं हिंदी क्षितिज भाग 2 के पाठ आत्मकथ्य से लिया गया है इसके कवि जयशंकर प्रसाद हैं।
2. प्रसंग – अंतिम पद्यांश में कवि अपने प्रेम की सुंदर स्मृतियों को याद करते हैं जो अब उनके जीवन का सहारा हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि उनकी पीड़ा अभी शांत है और वे इसे जगाना नहीं चाहते।
3. भावार्थ – उसकी (प्रेमिका की) सुंदर, लाल गालों वाली, नशीली और मनमोहक छाया में ऐसा लगता था मानो स्वयं प्रेमभरी भोर अपनी लालिमा यानी सुहाग माँगने आती है। अब बस उसकी यादें ही, इस थके हुए जीवन-मुसाफ़िर के लिए रास्ते का संबल बनी हुई हैं। क्या तुम मेरी जीवन रूपी गुदड़ी की सिलाई उधेड़ कर उसके भीतर झाँकना चाहते हो? मेरे इस छोटे से और साधारण से जीवन की बड़ी-बड़ी और महान कहानियाँ भला मैं आज कैसे सुनाऊँ? क्या यह ज़्यादा बेहतर नहीं है कि मैं दूसरों की कहानियाँ सुनता रहूँ और खुद चुप रहूँ? मेरी इतनी भोली-भाली और साधारण आत्मकथा सुनकर भला तुम्हें क्या हासिल होगा? और वैसे भी उसे सुनाने का यह सही समय नहीं है, क्योंकि मेरी चुपचाप सहने वाली पीड़ा अभी थककर सोई हुई है।
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