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अष्टमः पाठः — जटायोः शौर्यम्
कक्षा – नवमी (9वीं) | विषय – संस्कृतम् (शेमुषी भाग-1)
★ सम्पूर्ण अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि एवं परीक्षापयोगी नोट्स ★
📖 पाठ-सार / परिचयः
प्रस्तुत पाठ महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित आदिकाव्य 'रामायणम्' के अरण्यकाण्ड से संकलित है। इसमें रावण द्वारा सीता के हरण के समय गिद्धराज जटायु द्वारा दिखाए गए अदम्य साहस, वीरता और परोपकार की भावना का वर्णन है। वृद्ध और निहत्थे होते हुए भी जटायु ने शस्त्रधारी रावण से भीषण युद्ध कर धर्म और कर्तव्य की रक्षा की।
प्रस्तुत पाठ महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित आदिकाव्य 'रामायणम्' के अरण्यकाण्ड से संकलित है। इसमें रावण द्वारा सीता के हरण के समय गिद्धराज जटायु द्वारा दिखाए गए अदम्य साहस, वीरता और परोपकार की भावना का वर्णन है। वृद्ध और निहत्थे होते हुए भी जटायु ने शस्त्रधारी रावण से भीषण युद्ध कर धर्म और कर्तव्य की रक्षा की।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)—
(क) आयतलोचना का आसीत्? (विशाल नेत्रों वाली कौन थी?)
उत्तरम् — सीता
(ख) सा करुणं विलपन्ती कम् अपश्यत्/ददर्श? (उसने विलाप करते हुए किसे देखा?)
उत्तरम् — जटायुम् (गृध्रराजं जटायुम्)
(ग) जटायुः केन रावणस्य गात्रे व्रणं चकार? (जटायु ने किससे रावण के शरीर पर घाव किए?)
उत्तरम् — तुण्डेन नखैश्च (चोंच और नाखूनों से)
(घ) अरिन्दमः (शत्रुदमनकारी) कः आसीत्?
उत्तरम् — जटायुः
(ङ) जटायुः रावणस्य कति बाहून् व्यपाहरत्? (जटायु ने रावण की कितनी भुजाएँ उखाड़ दीं?)
उत्तरम् — दश बाहून् (दस भुजाओं को)
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर)—
(क) जटायोः शौर्यं कुतः संकलितम् अस्ति? (जटायु का शौर्य पाठ कहाँ से संकलित है?)
उत्तरम् — जटायोः शौर्यं महर्षि-वाल्मीकि-विरचितात् रामायणात् (अरण्यकाण्डात्) संकलितम् अस्ति।
(ख) जटायुः रावणं नीचां मतिं कुतः निवर्तयितुं कथयति? (जटायु रावण से नीच बुद्धि हटाने को क्यों कहता है?)
उत्तरम् — जटायुः रावणं परदाराभिमर्शनात् (परस्त्रीस्पर्शनात्) नीचां मतिं निवर्तयितुं कथयति।
(ग) धीरः पुरुषः किं न समाचरेत्? (धैर्यवान पुरुष को क्या नहीं करना चाहिए?)
उत्तरम् — यत् कर्म अन्यः विगर्हयेत् (निन्देत्), तत् कर्म धीरः पुरुषः न समाचरेत्।
(घ) जटायुः रावणस्य कीदृशं चापं सज्यं चकार/भञ्जाम् अकरोत्? (जटायु ने रावण का कैसा धनुष तोड़ा?)
उत्तरम् — जटायुः रावणस्य मुक्तामणिविभूषितं सशरं चापं चरणाभ्यां बभञ्ज।
(ङ) क्रोधमूर्च्छितः रावणः जटायुं कथम् अताडयत्? (क्रोधित रावण ने जटायु पर कैसे प्रहार किया?)
उत्तरम् — क्रोधमूर्च्छितः रावणः खड्गेन जटायोः वामबाहुं पक्षौ च अच्छिनत् (अताडयत्)।
प्रश्न 3. 'क' स्तम्भे विशेषणपदानि 'ख' स्तम्भे च विशेष्यपदानि दत्तानि, तानि योजयत—
| 'क' स्तम्भः (विशेषणानि) | 'ख' स्तम्भः (विशेष्याणि / शुद्ध मेलनम्) |
|---|---|
| (क) शुभाम् | गिरम् (वाणीम्) |
| (ख) हताश्वः | रावणः |
| (ग) महाबलः | जटायुः |
| (घ) पतगसत्तमः / पतगोत्तमः | जटायुः |
| (ङ) खगाधिपः | जटायुः |
| (च) क्रोधमूर्च्छितः | रावणः |
प्रश्न 4. स्थूलपदान्याधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए)—
(क) जटायुः तुण्डेन रावणस्य गात्रे व्रणं चकार।
प्रश्नम् — जटायुः केन रावणस्य गात्रे व्रणं चकार?
(ख) पतगश्रेष्ठः रावणं न्यवारयत्।
प्रश्नम् — कः रावणं न्यवारयत्?
(ग) परदाराभिमर्शनात् नीचां मतिं निवर्तय।
प्रश्नम् — कस्मात् नीचां मतिं निवर्तय?
(घ) रावणः खड्गेन जटायुं प्रहृतवान्।
प्रश्नम् — रावणः केन जटायुं प्रहृतवान्?
(ङ) खगाधिपः रावणस्य दश बाहून् व्यपाहरत्।
प्रश्नम् — कः रावणस्य दश बाहून् व्यपाहरत्?
प्रश्न 5. अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत (विलोम शब्द)—
| मूल-पदम् (शब्द) | विलोम-पदम् (विपरीतार्थक शब्द) |
|---|---|
| (क) मन्दम् (धीरे) | क्षिप्रम् / द्रुतम् (शीघ्र) |
| (ख) आर्यः (श्रेष्ठ) | अनार्यः (दुष्ट) |
| (ग) राक्षसेन्द्रः (राक्षसों का राजा) | देवेन्द्रः / नरेन्दः |
| (घ) पापम् (पाप) | पुण्यम् |
| (ङ) क्षमी (क्षमाशील) | क्रोधी / अक्षमी |
| (च) विगर्हितम् (निन्दित) | प्रशंसितम् / श्लाघितम् |
| (छ) वृद्धः (बूढ़ा) | युवा / तरुणः |
★ अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दवः (समास एवं सन्धि) ★
1. समास-विग्रहः —
• परदाराभिमर्शनात् = परेषां दाराः, तेषाम् अभिमर्शनात् (षष्ठी तत्पुरुष)
• खगाधिपः = खगानाम् अधिपः (षष्ठी तत्पुरुष)
• हताश्वः = हताः अश्वाः यस्य सः (बहुव्रीहि समास)
• भग्नधन्वा = भग्नं धनुः यस्य सः (बहुव्रीहि समास)
• क्रोधमूर्च्छितः = क्रोधेन मूर्च्छितः (तृतीया तत्पुरुष)
• खगाधिपः = खगानाम् अधिपः (षष्ठी तत्पुरुष)
• हताश्वः = हताः अश्वाः यस्य सः (बहुव्रीहि समास)
• भग्नधन्वा = भग्नं धनुः यस्य सः (बहुव्रीहि समास)
• क्रोधमूर्च्छितः = क्रोधेन मूर्च्छितः (तृतीया तत्पुरुष)
2. सन्धि-विच्छेदः —
• खगाधिपः = खग + अधिपः (दीर्घ सन्धि)
• ततस्तम् = ततः + तम् (विसर्ग सन्धि)
• पतगोत्तमः = पतग + उत्तमः (गुण सन्धि)
• प्रहस्योवाच = प्रहस्य + उवाच (गुण सन्धि)
• ततस्तम् = ततः + तम् (विसर्ग सन्धि)
• पतगोत्तमः = पतग + उत्तमः (गुण सन्धि)
• प्रहस्योवाच = प्रहस्य + उवाच (गुण सन्धि)
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