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Chapter 3 Sanskrit class 9th NCERT solution Pdf | class 9th Sanskrit chapter 3 Godohanam full Solution NCERT
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तृतीयः पाठः — गोदोहनम्
कक्षा – नवमी (9वीं) | विषय – संस्कृतम् (शेमुषी भाग-1)
★ सम्पूर्ण अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि एवं परीक्षापयोगी नोट्स ★
📖 पाठ-सार / परिचयः
प्रस्तुत पाठ श्री कृष्णचन्द्र त्रिपाठी द्वारा रचित 'चतुर्व्यूहम्' पुस्तक से संकलित एवं सम्पादित है। इस नाट्यांश में यह स्पष्ट किया गया है कि दैनिक कार्य को समय पर ही पूरा करना चाहिए। समय बीत जाने पर आलस्य अथवा एक साथ लाभ कमाने के लोभ में किया गया कार्य सदैव विनाशकारी व दुःखदायी होता है।
प्रस्तुत पाठ श्री कृष्णचन्द्र त्रिपाठी द्वारा रचित 'चतुर्व्यूहम्' पुस्तक से संकलित एवं सम्पादित है। इस नाट्यांश में यह स्पष्ट किया गया है कि दैनिक कार्य को समय पर ही पूरा करना चाहिए। समय बीत जाने पर आलस्य अथवा एक साथ लाभ कमाने के लोभ में किया गया कार्य सदैव विनाशकारी व दुःखदायी होता है।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)—
(क) मल्लिका पूजार्थं सखीभिः सह कुत्र गच्छति स्म? (मल्लिका पूजा के लिए कहाँ जा रही थी?)
उत्तरम् — काशीविश्वनाथमन्दिरम् (वाराणसी)
(ख) उमायाः पितामहेन कति सेटकपरिमितं दुग्धम् अपेक्ष्यते स्म? (उमा के दादाजी को कितने दूध की आवश्यकता थी?)
उत्तरम् — त्रिशत-सेटकपरिमितम् (300 लीटर)
(ग) कुम्भकारः घटान् किमर्थं रचयति? (कुम्हार घड़े किसलिए बनाता है?)
उत्तरम् — जीविकाहेतोः (अपनी आजीविका चलाने के लिए)
(घ) कस्याः पादप्रहारैः चन्दनः रक्तरञ्जितः अभवत्? (किसके प्रहार से चन्दन लहुलुहान हुआ?)
उत्तरम् — धेनोः / नन्दिन्याः (गाय के पैरों के प्रहार से)
(ङ) मल्लिकायाः पूजां प्रति चन्दनस्य का प्रतिक्रिया आसीत्?
उत्तरम् — प्रसन्नता / सहर्षम् (वह प्रसन्न था)
प्रश्न 2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखिए)—
(क) मल्लिका चन्दनश्च मासपर्यन्तं धेनोः सेवां कथम् अकुरुताम्?
उत्तरम् — मल्लिका चन्दनश्च धेनुं घासादिकं गुडादिकं च अभोजयताम्, तिलकं धारयताम्, रात्रौ नीराजनेनापि तोषयताम्।
(ख) कालः कस्य रसं पिबति? (समय किसका रस पी जाता है?)
उत्तरम् — क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य आदानस्य, प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः रसं कालः पिबति।
(ग) घटमूल्यार्थं यदा मल्लिका स्वाभूषणं दातुं प्रयतते तदा कुम्भकारः किं वदति?
उत्तरम् — कुम्भकारः वदति यत् "पुत्रिके! नाहं पापकर्मा करोमि। कथमपि नेच्छामि त्वाम् आभूषणहीनां कर्तुम्। नय यथाभिलषितान् घटान्।"
(घ) मल्लिकायाः सखीभिः सह यात्रायाः विषये चन्दनः किं कथयति?
उत्तरम् — चन्दनः कथयति यत् "गच्छ, सखीभिः सह धर्मयात्रया आनन्दिता च भव। अहं सर्वमपि परिपालयिष्यामि, शिवास्ते सन्तु पन्थानः।"
(ङ) मासपर्यन्तं धेनोः अदोहनस्य किं कारणम् आसीत्?
उत्तरम् — मासपर्यन्तं धेनोः अदोहनस्य कारणं मासस्यान्ते एकत्रैव त्रिशत-सेटकपरिमितं दुग्धं प्राप्य धनिकः भवितुं चन्दनस्य विचारः आसीत्।
प्रश्न 3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए)—
(क) मल्लिका सखीभिः सह धर्मयात्रायै गता आसीत्।
प्रश्नम् — मल्लिका काभिः सह धर्मयात्रायै गता आसीत्?
(ख) चन्दनः दुग्धदोहनं कृत्वा एव स्वप्रातराशस्य प्रबन्धम् अकरोत्।
प्रश्नम् — चन्दनः किं कृत्वा एव स्वप्रातराशस्य प्रबन्धम् अकरोत्?
(ग) मोदकानि पूजानिमित्तानि रचितानि आसन्।
प्रश्नम् — मोदकानि किमर्थम् रचितानि आसन्?
(घ) मल्लिका पतिं चतुरतमम् मन्यते।
प्रश्नम् — मल्लिका पतिं कीदृशम् मन्यते?
(ङ) नन्दिनी पदाभ्याम् ताडयित्वा चन्दनं रक्तरञ्जितं करोति।
प्रश्नम् — नन्दिनी काभ्याम् ताडयित्वा चन्दनं रक्तरञ्जितं करोति?
प्रश्न 4. मञ्जूषातः पदानि चित्वा कः कं प्रति कथयति इति लिखत (किसने किससे कहा)—
| कथनम् (वाक्यम्) | कः कथयति | कां/कं प्रति |
|---|---|---|
| (क) "स्वामिन्! प्रत्यागता अहम्। आस्वादय प्रसादम्।" | मल्लिका | चन्दनं प्रति |
| (ख) "धन्योऽसि मातुल! याम्यधुना।" | उमा | चन्दनं प्रति |
| (ग) "त्रिंशत्-सेटकपरिमितं दुग्धम्! शोभनम्, व्यवस्था भविष्यति।" | चन्दनः | उमां प्रति |
| (घ) "मूल्यं तु दुग्धं विक्रीय एव दातुं शक्यते।" | चन्दनः | देवेशं (कुम्भकारं) प्रति |
| (ङ) "पुत्रिके! नाहं पापकर्मा करोमि।" | देवेशः | मल्लिकां प्रति |
| (च) "देवि! मयापि ज्ञातं यत् अस्माभिः सर्वथा अनुचितमेव कृतम्।" | चन्दनः | मल्लिकां प्रति |
प्रश्न 5. सन्धिं / सन्धि-विच्छेदं कुरुत (सन्धि एवं विच्छेद)—
| विच्छेद-पदम् | सन्धि-पदम् (शुद्ध रूप) |
|---|---|
| (क) शिवाः + ते | शिवास्ते (विसर्ग सन्धि) |
| (ख) मनः + रथः | मनोरथः (विसर्ग सन्धि) |
| (ग) सप्ताह + अन्ते | सप्ताहन्ते (दीर्घ सन्धि) |
| (घ) न + इच्छामि | नेच्छामि (गुण सन्धि) |
| (ङ) अति + उत्तमः | अत्युत्तमः (यण् सन्धि) |
| (च) यथा + इच्छम् | यथेच्छम् (गुण सन्धि) |
प्रश्न 6. प्रकृति-प्रत्ययं संयोज्य विभज्य वा लिखत (प्रकृति-प्रत्यय)—
| धातु + प्रत्ययः | निष्पन्नं पदम् |
|---|---|
| (क) कृ + क्त्वा | कृत्वा |
| (ख) वि + क्री + ल्यप् | विक्रीय |
| (ग) प्र + आप् + ल्यप् | प्राप्य |
| (घ) पठ् + क्त्वा | पठित्वा |
| (ङ) ताड् + शतृ | ताडयन् / ताडयित्वा |
| (च) दुह् + तुमुन् | दोग्धुम् |
★ अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दवः (श्लोकार्थ एवं नीति-शिक्षा) ★
1. प्रमुख नीति-श्लोकः —
"आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्॥"
सरलार्थः — जिस कार्य को शीघ्र कर लेना चाहिए, उसे यदि समय पर नहीं किया जाता, तो समय उसके सम्पूर्ण रस (आनंद/फल) को नष्ट कर देता है।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्॥"
सरलार्थः — जिस कार्य को शीघ्र कर लेना चाहिए, उसे यदि समय पर नहीं किया जाता, तो समय उसके सम्पूर्ण रस (आनंद/फल) को नष्ट कर देता है।
2. समास-विग्रहः —
• धर्मयात्रा = धर्मस्य यात्रा (षष्ठी तत्पुरुष समास)
• मासान्ते = मासस्य अन्ते (षष्ठी तत्पुरुष समास)
• रक्तरञ्जितः = रक्तेन रञ्जितः (तृतीया तत्पुरुष समास)
• मासान्ते = मासस्य अन्ते (षष्ठी तत्पुरुष समास)
• रक्तरञ्जितः = रक्तेन रञ्जितः (तृतीया तत्पुरुष समास)
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