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Class 10th आत्मकथ्य – जयशंकर प्रसाद
प्रेमचंद के संपादन में 'हंस' पत्रिका के 'आत्मकथा विशेषांक' के लिए, जयशंकर प्रसाद के मित्रों ने उनसे अपनी आत्मकथा लिखने का आग्रह किया। प्रसाद जी को लगता था कि उनके साधारण जीवन में ऐसा कुछ विशेष नहीं है जिसे वे जगजाहिर करें। इसी संदर्भ में उन्होंने यह कविता लिखी।
काव्य पंक्तियाँ (पैराग्राफ 1)
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
प्रसंग (Context 1)
कवि आत्मकथा न लिखने के कारणों को बताते हुए जीवन की नश्वरता और असफलताओं को सार्वजनिक करने की अपनी अनिच्छा और दूसरों द्वारा उपहास किए जाने के डर को दर्शाता है।
संदर्भ (Reference)
प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता 'आत्मकथ्य' से ली गई हैं।
भावार्थ (Line-by-Line Meaning)
- भंवरा गूँज-गूँज कर न जाने अपने जीवन की कौन-सी अनकही कहानी कह रहा है। लाइन 1
- देखो, आज कितनी सारी घनी पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं, जो जीवन की नश्वरता और दुखों को दिखाती हैं। लाइन 2
- इस अथाह, गंभीर और अंतहीन नीले आकाश के नीचे न जाने कितने लोगों के जीवन का इतिहास मौजूद हैं। लाइन 3
- और इन आत्मकथाओं को पढ़कर लोग एक-दूसरे पर गंदा, कड़वा और व्यंग्यात्मक मज़ाक उड़ाते ही रहते हैं। लाइन 4
- हे मित्रो! इतना सब जानने के बावजूद क्या तुम चाहते हो कि मैं अपनी बीती हुई कमज़ोरियों और असफलताओं को लिख डालूँ? लाइन 5
- क्या तुम यह जानकर खुश होगे जब देखोगे कि मेरे जीवन का यह घड़ा पूरी तरह से खाली है? लाइन 6
- लेकिन, मुझे यह डर है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी कहानी पढ़कर तुम्हें लगे कि तुमने ही मेरे जीवन का सारा रस निचोड़ लिया है। लाइन 7
- और कहीं तुम खुद को ही मेरा सुख-रस लेकर अपने जीवन रूपी घड़े को भरने वाला समझने लगो। लाइन 8
अन्य तैयारी सामग्री:
काव्य पंक्तियाँ (पैराग्राफ 2)
यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
प्रसंग (Context 2)
यहाँ कवि अपनी आत्मकथा में अपनी भूलों या दूसरों के छलावों को लिखने में संकोच व्यक्त करता है। वह अपने जीवन के उन पलों और एक ऐसे सुखद सपने के बारे में बात करता है जो उसके पास आते-आते दूर चला गया।
संदर्भ (Reference)
यह पंक्तियाँ कक्षा 10 की कविता 'आत्मकथ्य' से हैं, जिसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं।
भावार्थ (Line-by-Line Meaning)
- यह कैसी विडंबना है! हे मेरी भोली आत्मा! क्या मैं अपनी ही सरलता का जग में मज़ाक बनवाऊँ? लाइन 9
- क्या मैं आत्मकथा में अपनी ही की गई गलतियाँ गिनाऊँ या दूसरों द्वारा मेरे साथ किए गए धोखे और छल को सबको दिखलाऊँ? लाइन 10
- मैं उन मधुर चाँदनी रातों की पवित्र और उज्ज्वल प्रेम-कहानी को भला जग को कैसे सुनाऊँ? लाइन 11
- और उन खुशी के पलों की बातें, जो खिलखिला कर हँसते हुए बिताई थीं, मैं पूरी दुनिया को कैसे बताऊँ? लाइन 12
- मुझे वह पूर्ण सुख कभी नहीं मिला, जिसका सपना देखते-देखते मैं जाग गया था। लाइन 13
- वह सुख मेरे पास आकर गले लगने ही वाला था कि अचानक मुस्कुराकर मुझसे दूर भाग गया। लाइन 14
Mains Education स्पेशल:
काव्य पंक्तियाँ (पैराग्राफ 3)
जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
प्रसंग (Context 3)
अंतिम पैराग्राफ में कवि अपने जीवन की मीठी और प्रेमभरी स्मृतियों को याद करता है। वह बताता है कि अब ये यादें ही उसके अकेलेपन का सहारा हैं और वह अभी इन पुरानी बातों को फिर से याद करके खुद को दुखी नहीं करना चाहता है।
संदर्भ (Reference)
संदर्भ पूर्ववत (पहले की तरह) - कक्षा 10, कविता 'आत्मकथ्य', जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित।
भावार्थ (Line-by-Line Meaning)
- उसकी सुंदर, लाल गालों वाली, नशीली और मनमोहक छाया में... लाइन 15
- ...ऐसा लगता था मानो स्वयं प्रेमभरी भोर अपनी लालिमा यानी सुहाग माँगने आती है। लाइन 16
- अब बस उसकी यादें ही, इस थके हुए जीवन-मुसाफ़िर के लिए रास्ते का संबल बनी हुई हैं। लाइन 17
- क्या तुम मेरी जीवन रूपी गुदड़ी की सिलाई उधेड़ कर उसके भीतर झाँकना चाहते हो? लाइन 18
- मेरे इस छोटे से और साधारण से जीवन की बड़ी-बड़ी और महान कहानियाँ भला मैं आज कैसे सुनाऊँ? लाइन 19
- क्या यह ज़्यादा बेहतर नहीं है कि मैं दूसरों की कहानियाँ सुनता रहूँ और खुद चुप रहूँ? लाइन 20
- मेरी इतनी भोली-भाली और साधारण आत्मकथा सुनकर भला तुम्हें क्या हासिल होगा? लाइन 21
- और वैसे भी उसे सुनाने का यह सही समय नहीं है, क्योंकि मेरी चुपचाप सहने वाली पीड़ा अभी थककर सोई हुई है। लाइन 22
महत्वपूर्ण MCQ:
इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी ने यह संदेश दिया है कि हर व्यक्ति को अपनी आत्मकथा लिखने की ज़रूरत नहीं है, खासकर तब जब उसका जीवन साधारण हो। कभी-कभी मौन रहना और दूसरों को सुनना ज़्यादा बेहतर होता है।
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