निबंध लेखन - साहित्य और समाज || Nibandh Lekhan - Sahitya Or Samaj Class

8. साहित्य और समाज (म. प्र. 2026-27)

रूपरेखा—(1) प्रस्तावना, (2) साहित्य क्या है ?, (3) समाज क्या है ?, (4) साहित्य पर समाज का प्रभाव, (5) समाज पर साहित्य का प्रभाव, (6) साहित्य और समाज का सम्बन्ध, (7) निष्कर्ष।

प्रस्तावना—साहित्य और समाज दोनों का अटूट संबंध है। जिस प्रकार सूर्य की किरणों से जगत में प्रकाश फैलता है उसी प्रकार साहित्य के आलोक से समाज में चेतना का संचार होता है। साहित्य समाज के निर्माण में योगदान देता है और समाज के द्वारा ही साहित्य का निर्माण होता है। अतः दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

साहित्य क्या है ?—"हितेन सह सहितेन् तस्य भावं साहित्यं" अर्थात् साहित्य वह है जिसमें हित की भावना हो, जिसमें समष्टि का हित सार्वहित हो। दूसरे शब्दों में, साहित्य रमणीय शब्द-अर्थों से गुम्फित भावों की माला है जिसमें सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् तीनों का समन्वय होता है। आचार्य जगन्नाथ ने साहित्य को परिभाषित करते हुए लिखा है—
रमणीयार्थः प्रतिपादकः शब्दः काव्यम् अर्थात् रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द एवं अर्थों के साहित्य को साहित्य कहते हैं।

समाज क्या है ?—आदिकाल में हिंसक पशुओं से बचाव के लिए या अन्य कारणों से मानव ने समूह में रहने के लिए अपने कुछ अधिकारों को प्रदान कर एवं अपने कुछ कर्तव्य निश्चित कर समाज का निर्माण किया। तब समाज का स्वरूप अत्यन्त ही सीमित था, किन्तु आज हमारा समाज अत्यन्त ही विस्तृत हो गया है। आज मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के रूप में जन्म से लेकर मृत्यु तक समाज से जुड़ा रहता है।

साहित्य पर समाज का प्रभाव—साहित्य के निर्माण में समाज का प्रमुख हाथ रहता है और बिना समाज के साहित्य का निर्माण असम्भव है। जिस समय का समाज जैसा होगा उस समय उसी प्रकार के साहित्य की रचना की जायेगी। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। यदि हम किसी समाज या जाति के उत्थान-पतन, आचार-व्यवहार, सभ्यता, संस्कृति आदि को देखना चाहते हैं, तो यह हमें उस समाज से सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन करने से ज्ञात हो जायेगा। संसार की सभ्य जातियों में उन्हीं की गणना होती है जिनका साहित्य उच्च कोटि का होता है।

समाज पर साहित्य का प्रभाव—समाज अपने अनुरूप साहित्य को बदलता है तो साहित्य समाज को बदलने का प्रयास करता है। साहित्य मनुष्य को गतिशीलता प्रदान करता है। वह अन्धविश्वासों, रूढ़ियों एवं सड़ी-गली मानसिकता को दूर कर समाज को नई रोशनी प्रदान करता है। यदि फ्रान्स में रूसो का, रूस में मार्क्स का साहित्य नहीं होता तो इन देशों में क्रान्तियाँ नहीं हुई होतीं। हमारे देश में भी इस प्रकार के उदाहरणों की कमी नहीं है। तुलसी तथा सूर के साहित्य ने समाज में भक्ति का संचार किया। श्री बंकिम चन्द चटर्जी के वन्देमातरम् नामक गान ने असंख्य भारतीयों को मातृभूमि पर मर मिटने के लिए प्रोत्साहित किया।

साहित्य और समाज का संबंध—साहित्य और समाज का बहुत ही घनिष्ठ संबंध है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। साहित्य मनुष्य का उज्जवलतम चेतना का वरदान है। इसका अस्तित्व कवि या लेखक के ही सुख के लिए सीमित नहीं होता। 'स्वान्तः सुखाय' के लिए रचित तुलसी का मानस आज समाज सुखाय व समाज निर्माणार्थ एक आदर्श ग्रन्थ बन गया है। साहित्य शक्ति का स्रोत है। समाज क्रिया लोक की कर्कशता से युक्त है, परन्तु साहित्य विशुद्ध भाव लोक की सर्जना, जिसका मानव जीवन पर तत्कालीन रुप से प्रभाव पड़ता है। प्रेम, दया, सेवा, उपकार जैसे मानवीय गुणों का संचार समाज में साहित्य के माध्यम से ही हो सकता है।

निष्कर्ष—आज का युग अन्धानुकरण का युग है, हम पाश्चात्य रंग में इतने डूब गये हैं कि हम इससे निकलने में अपना विनाश समझते हैं। विज्ञान के बढ़ते चरणों ने हमारे मनोबल को झकझोर कर रख दिया है। आज हमारा समाज भग्न हो रहा है और नई सभ्यता के पुजारी उसका तमाशा देख रहे हैं। समाज को उत्कृष्ट साहित्य की आवश्यकता है जिससे उसका उत्थान हो सके। हम साहित्य को नये-नये आयाम दें। काव्यों की रचना हमारे कर्मों के अनुरूप हों, कहानी हमारे जीवन में गहरी उतरे और गीतों के बीज हमारे हृदय में अंकुरित हों। हमारा समाज अपने पुराने वैभव को प्राप्त कर सके इसके लिए हम साहित्य को नये आयाम दें।

"अंधकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है।
मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नहीं है॥"

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