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पाठ 5: गलता लोहा
अभ्यास प्रश्नोत्तर
1. कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का ज़िक्र आया है?
उत्तर: जब धनराम 13 का पहाड़ा याद नहीं कर पाता, तो मास्टर त्रिलोक सिंह उसे छड़ी से पीटते हैं। वे कहते हैं कि तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है, विद्या का ताप कहाँ लगेगा? यहीं दोनों विद्याओं का ज़िक्र आया है।
2. धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं मानता था?
उत्तर: धनराम जानता था कि मोहन एक कुशाग्र बुद्धि वाला उच्च जाति (ब्राह्मण) का छात्र है, जबकि वह स्वयं नीची जाति (लुहार) और मंदबुद्धि है। मास्टर जी भी मोहन को बड़ा आदमी बनने का आशीर्वाद देते थे, इसलिए वह मोहन को प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता था।
3. धनराम को मोहन के किस व्यवहार पर आश्चर्य होता है और क्यों?
उत्तर: मोहन एक ब्राह्मण पुत्र था। जब वह धनराम लुहार की दुकान पर बैठकर धौंकनी चलाने लगा और भट्ठी में लोहे को गोल आकार देने लगा, तो धनराम को आश्चर्य हुआ, क्योंकि ऊँची जाति के लोग ऐसा काम नहीं करते थे।
4. मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का एक नया अध्याय क्यों कहा है?
उत्तर: लखनऊ आकर मोहन की पढ़ाई छूट गई। रमेश ने उसे घरेलू नौकर बना दिया। गाँव का मेधावी छात्र शहर की भीड़ में खोकर रह गया और उसका भविष्य अंधकारमय हो गया, इसलिए इसे एक नया (और दुखद) अध्याय कहा गया है।
5. मास्टर त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने ज़बान के चाबुक कहा है और क्यों?
उत्तर: मास्टर जी ने धनराम से कहा था, "तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?" इसे ज़बान के चाबुक कहा गया है क्योंकि यह कथन धनराम को शारीरिक चोट से ज़्यादा मानसिक रूप से आहत करता है।
6. बिरादरी का यही सहारा होता है। - यह कथन किसने, किससे और किस प्रसंग में कहा?
उत्तर: यह कथन मोहन के पिता वंशीधर ने रमेश से कहा था। जब रमेश मोहन को अच्छी पढ़ाई के लिए अपने साथ लखनऊ ले जाने को तैयार हो गया, तब कृतज्ञता प्रकट करते हुए वंशीधर ने यह बात कही थी।
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