वर्ण परिचय जो परीक्षा में हर बार आता है || Varnmala Evam Varno ke Prakar , Swar , Vyanjan , Visarg , Haswa Swar Deergha Swar , Plut Swar
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संस्कृत व्याकरण - वर्ण परिचय प्रकरण | Mains Education App
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संस्कृत व्याकरण अध्ययन सामग्री
अध्याय - २
वर्ण परिचय प्रकरण
व्याकरण भाग • संस्कृत वर्णमाला, माहेश्वर सूत्र एवं उच्चारण स्थान
02
परिभाषा वर्ण एवं वर्णमाला
भाषा में प्रयुक्त होने वाली सबसे छोटी इकाई 'वर्ण' कहलाती है।
दूसरे शब्दों में वर्ण का अर्थ है 'अक्षर' या 'ध्वनि'। ध्वनियों में उस छोटी से छोटी मुख से निकली हुई ध्वनि को 'वर्ण' कहते हैं, जिसका विभाग न हो सके; जैसे— अ, इ, उ, क, च्, ट्, त्, प् इत्यादि।
📌 वर्णमाला: वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं।
मूल आधार संस्कृत वर्णमाला के १४ माहेश्वर सूत्र
महर्षि पाणिनि ने संस्कृत वर्णमाला को १४ माहेश्वर सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है। माना जाता है कि भगवान् शंकर (महेश्वर) ने नृत्य के बाद चौदह बार अपना डमरू बजाया जिससे इन १४ माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति हुई। ये सूत्र इस प्रकार हैं—
१अइउण्(अ, इ, उ)
२ऋऌक्(ऋ, ऌ)
३एओङ्(ए, ओ)
४ऐऔच्(ऐ, औ)
५हयवरट्(ह, य, व, र)
६लण्(ल)
७ञमङणनम्(ञ, म, ङ, ण, न)
८झभञ्(झ, भ)
९घढधष्(घ, ढ, ध)
१०जबगडदश्(ज, ब, ग, ड, द)
११खफछठथचटतव्(ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त)
१२कपय्(क, प)
१३शषसर्(श, ष, स)
१४हल्(ह)
संक्षेप विधि प्रत्याहार
इन माहेश्वर सूत्रों से ४२ प्रत्याहारों का निर्माण किया जाता है। प्रत्याहार दो वर्णों से बनता है। प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्णों की गणना करते समय अन्तिम हलन्त वर्णों की गणना नहीं करते हैं।
उदाहरणार्थ: 'अच्' प्रत्याहार के वर्णों की गणना करने के लिए माहेश्वर सूत्रों में 'अ' वर्ण से लेकर 'च्' वर्ण तक जितने भी वर्ण आते हैं उनमें से अन्तिम (ण्, क्, ङ्, च्) वर्णों को छोड़कर गणना करते हैं। इस प्रकार अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ' वर्ण आते हैं।
इसी प्रकार से अण् (अ, इ, उ), इक् (इ, उ, ऋ, ऌ), यण् (य, व, र, ल्), चर् (च, ट, त, क, प, श, ष, स) इत्यादि प्रत्याहारों को जानना चाहिए।
४२ प्रत्याहार सूची:
(१)अण्
(२)अक्
(३)अच्
(४)अट्
(५)अण्
(६)अम्
(७)अश्
(८)अल्
(९)इक्
(१०)इच्
(११)इण्
(१२)उक्
(१३)एङ्
(१४)एच
(१५)ऐच्
(१६)हश्
(१७)हल्
(१८)यण्
(१९)यम्
(२०)यञ्
(२१)यय्
(२२)यर्
(२३)वश्
(२४)वल्
(२५)शल्
(२६)मय्
(२७)ङम्
(२८)झष्
(२९)झश्
(३०)झय्
(३१)झर्
(३२)झल्
(३३)भष्
(३४)जश्
(३५)बश्
(३६)खय्
(३७)खर्
(३८)छव्
(३९)चय्
(४०)चर्
(४१)शर्
(४२)शल्
विभाजन वर्णों के भेद
वर्ण दो प्रकार के होते हैं—
(१) स्वर या अच् वर्ण(२) व्यंजन या हल् वर्ण
(१) स्वर (अच्)
जिन वर्णों के उच्चारण करने में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं ली जाती है उन्हें स्वर कहते हैं। माहेश्वर सूत्रों में 'अच्' प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले 'अ' से 'औ' तक के वर्ण स्वर कहलाते हैं।
स्वर के भेद — स्वर के तीन भेद होते हैं:
(क) ह्रस्व स्वर: जिस स्वर के उच्चारण करने में एक मात्रा का समय लगे उसे ह्रस्व स्वर कहते हैं। जैसे— अ, इ, उ, ऋ, ऌ ये पाँच ह्रस्व स्वर हैं।
(ख) दीर्घ स्वर: जिस स्वर के उच्चारण करने में दो मात्रा का समय लगे उसे दीर्घ स्वर कहते हैं। जैसे— आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ ये आठ दीर्घ स्वर हैं।
(ग) प्लुत स्वर: जिस स्वर के उच्चारण करने में तीन मात्रा का समय लगे उसे प्लुत स्वर कहते हैं। प्लुत स्वर के बाद में ३ का अंक बना होता है। जैसे— ओ३म्।
सभी ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वर वर्ण अनुनासिक एवं अननुनासिक भेद से दो प्रकार के होते हैं:
अनुनासिक: जिस स्वर के उच्चारण करने में मुख और नासिका दोनों का प्रयोग होता है, उसे अनुनासिक स्वर वर्ण कहते हैं। जैसे— ऑ, ऐँ इत्यादि सम्पूर्ण स्वर वर्ण।
अननुनासिक (निरनुनासिक): जिस स्वर का उच्चारण केवल मुख से होता है, उसे अननुनासिक या निरनुनासिक स्वर कहते हैं।
(२) व्यंजन (हल्)
जिन वर्णों का उच्चारण करने में किसी स्वर की सहायता ली जाती है, उन्हें व्यंजन या हल् कहते हैं। व्याकरण में स्वर रहित व्यंजन को लिखने के लिए उसके नीचे हल् (्) का चिह्न लगाते हैं।
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