भाव पल्लवन किसे कहते हैं? भाव विस्तार किसे कहते हैं? Bhav Pallavan ya Bhav Vistar ki paribhasha evam Udahran #HindiGrammar

भाव पल्लवन / भाव विस्तार
10. भाव पल्लवन / भाव विस्तार
1. खग-मृग बसत आरोग्य बन, हरि अनाथ के नाथ (म.प्र. 2011)
प्राकृतिक जीवन आरोग्यवर्धक होता है। वन में सभी पशु-पक्षी स्वस्थ रहते हैं। उनकी देखरेख कोई चिकित्सक भी नहीं करता। अनाथों का नाथ भगवान होता है। पशु-पक्षी स्वच्छ जल पीते हैं एवं शुद्ध वायु ग्रहण करते हैं। इन्हीं तत्वों के सहयोग से वे कभी बीमार नहीं पड़ते। अतः स्वस्थ एवं निरोग रहने के लिए प्राकृतिक जीवन अपनाना चाहिए।
2. पुरुषत्व अभय का जनक है और देवत्व शांति का
पुरुषार्थी व्यक्ति कभी डरता नहीं। निडरता वहीं निवास करती है, जहाँ पुरुषत्व होता है। मनुष्य में जब मानवता एवं देवत्व का विकास होने लगता है, तो सर्वत्र शांति छा जाती है। निर्भयता एवं शांति की उर्वर भूमि पर मानवता की फसल लहलहाती है।
3. बल अंधा है और उसकी गति पथ-प्रदर्शक के अधीन है
शक्ति का बोध मनुष्य को अंधा बना देता है। शक्तिशाली मद के अधीन होता है। उसमें अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित के विचार की शक्ति समाप्त हो जाती है। अत्याचार, अनाचार एवं अविवेक का जीवन में आधिक्य होने लगता है। बल का यदि सदुपयोग किया जाए तो मनुष्य का जीवन सफल भी हो सकता है।
4. हमारी संस्कृति की जड़ें आज भी काफी मजबूत हैं
हमारे जीवन और आचार-विचार पर भारतीय संस्कृति एवं परम्परा का बहुत गहरा प्रभाव है। आज बदलते जीवन मूल्यों एवं आदर्शों के युग में भारतीय संस्कृति का महत्व है। भारतीय समाज में आज भी उन आदर्शों को श्रद्धा एवं विश्वास की दृष्टि से देखा जाता है। इससे प्रमाणित होता है कि हमारी संस्कृति की जड़ें भी काफी मजबूत हैं। संस्कृति के आदर्शों और मूल्यों को सरलता से समाप्त नहीं किया जा सकता।
5. अमीरी की तुलना में गरीबी अधिक सुखद है (म.प्र. 2016, महत्वपूर्ण)
अमीरी का सम्बन्ध सुख से है और गरीबी का दुःख से किन्तु गरीबी या दुःख को महसूस न करने वाले का जीवन निरर्थक है। हजारों सुखों पर दुःख न्यौछावर है। सुखी व्यक्ति दुःख का मोल समझ ही नहीं सकता। दुःख हमारे जीवन को परिमार्जित करता है। यह हमें सीख देता है कि हम दूसरों को दुःख न दें। सुख में यह गुण नहीं है।
6. प्रकृति पर विजय पाकर ही मनुष्य दम लेता है (म.प्र. 2020)
मनुष्य में अद्भुत जीवटता होती है। उसमें कभी हार न मानने की प्रवृत्ति भी पाई जाती है। वह प्रकृति से भी हार नहीं मानता। उसे जब-तब चुनौती देता रहता है। पृथ्वी के तल से अमूल्य भण्डार निकाल लेना, चाँद तक पहुँच जाना, आकाश में उड़ लेना क्या प्रकृति पर विजय पाना नहीं है।
7. आशा से आकाश थमा है
मनुष्य विचारशील एवं कर्मशील प्राणी है। जीवन के विभिन्न क्रिया-कलापों में उसे कभी जीत, तो कभी हार मिलती है। जीत का संबंध सफलता से एवं हार का संबंध असफलता से है। असफलताओं से हमें हार नहीं मानना चाहिए। आशा और प्रयास वह मंत्र है, जो एक दिन हमें जीत के करीब ले जाते हैं, अतः जीवन में कभी आशा नहीं छोड़नी चाहिए।
8. विद्या से विनम्रता आती है (म.प्र. 2012, महत्वपूर्ण)
विद्या से युक्त व्यक्ति या विद्यार्थी विनय का पात्र बनता है वह झुकना सीखता है उद्दंडता नहीं। विनम्रता से विद्यार्थी अपने स्वाभिमान की रक्षा कर सकता है। विनम्रता विद्यार्थी का वह गुण है जो गुरु के मार्ग पर चल कर ग्रहण किया जा सकता है जिससे व्यक्तित्व का चुनाव संभव होता है।
9. 'स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' (म.प्र. 2013)
मनुष्य का जन्म एवं मृत्यु स्वतंत्र है इस पर किसी का अधिकार नहीं। हर व्यक्ति स्वतंत्र है वह स्वतंत्रता के दायरे में रहते हुए अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकता है क्योंकि यह स्वतंत्रता उसे जन्म से प्राप्त होती है।
10. "बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।" (म.प्र. 2025)
बैर का उद्गम स्थल क्रोध है। क्रोध ही आगे चलकर बैर में परिणत हो जाता है। जब किसी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति का अहित किया जाता है तब उसे क्रोध आता है। यदि वह बदला लेने में असमर्थ होता है तो उसका क्रोध बहुत काल तक उसके हृदय में बना रहता है। बहुत समय तक विद्यमान रहने वाले क्रोध को ही बैर कहा जाता है। क्रोध से बैर बनने की प्रक्रिया के फलस्वरूप ही इसे क्रोध का अचार या मुरब्बा कहा जाता है। जिस प्रकार विशेष ढंग से तैयार किया गया मुरब्बा अधिक टिकाऊ बन जाता है, वैसे ही बहुत समय तक हृदय में स्थित क्रोध बैर का रूप धारण कर लेता है।
11. पर उपदेश कुशल बहुतेरे (म.प्र. 2015, 19)
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है समाज में मनुष्य जीवन बीताता और उसके बीच रहता है। एक ऐसा वर्ग होता, जो समाज में दूसरों को शिक्षा देता है अच्छी ज्ञान की बातें बताता है तथा हर बात की सलाह देता है किन्तु ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो शिक्षा ग्रहण कर स्वयं पालन करते हुए व्यावहारिक जीवन में अपनाए इसलिए शिक्षा देना आसान है किन्तु उसे अपने व्यवहार में उतारना कठिन है।
12. दूर के ढोल सुहावने होते हैं (म.प्र. 2018)
दूर की साधारण वस्तु भी अच्छी लगती है अर्थात् जीवन में वास्तविक वस्तु का परीक्षण पास में रहकर ही किया जा सकता है। दूर से हर सुंदर दिखने वाली वस्तु बहुत सुंदर नहीं होती। इसी प्रकार जो ढोल दूर से सुहावने लगते हैं पास जाने पर कई बार उसकी ध्वनि कर्कश सुनाई पड़ती है।
13. जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है (म.प्र. 2020, 23)
संस्कृत में एक सूक्ति है, 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' अर्थात् जननी एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। क्योंकि माँ एवं जन्मभूमि के हम पर इतने उपकार हैं कि उससे कभी उऋण नहीं हुआ जा सकता है। इस संदर्भ में महान कवि गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर कहते हैं कि "यदि मुझे प्रेम के बदले में स्वर्ग दिया जायेगा तो मैं लेने से इंकार कर दूँगा, क्योंकि स्वर्ग का वैभव विलास की मदिरा में डुबाने वाला होता है। जबकि प्रेम में व्यक्ति धूप, छाँव, कंटकाकीर्ण मार्ग से चलकर एक नया इंसान बनता है। माँ का ममत्व एवं वात्सल्य स्वर्ग से बढ़कर है। जन्मभूमि की शीतल छाया एवं इसकी गोद में पलना, बढ़ना एवं कर्मभूमि के कर्मवीर बनना स्वर्ग से भी महान है।
14. मन के हारे हार है मन के जीते जीत (म.प्र. 2024)
मानव जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ और कठिनाइयाँ आती रहती हैं। जीवन पथ अनेक कंटकों से परिपूर्ण रहता है। संघर्ष के लिए मन में धैर्य और साहस की आवश्यकता होती है। जीवन में चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ या समस्याएँ आये मनुष्य को कभी साहस और धैर्य नहीं खोना चाहिए। जिसका मन हार गया अर्थात् साहस टूट गया, वह जीवन में कुछ भी नहीं कर सकता। जो मनुष्य हारकर भी मन में साहस बाँधे रखता है, वह हारकर भी जीत जाता है।

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