- Get link
- X
- Other Apps
Class 9th Sanskrit Chapter 6 Lohtula Solution and Explanation// NCERT class 9th Sanskrit Lohtula Explanation in Hindi
- Get link
- X
- Other Apps
📱 MAINS EDUCATION APP
षष्ठः पाठः — लौहतुला
कक्षा – नवमी (9वीं) | विषय – संस्कृतम् (शेमुषी भाग-1)
★ सम्पूर्ण अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि एवं परीक्षापयोगी नोट्स ★
📖 पाठ-सार / परिचयः
प्रस्तुत पाठ विष्णु शर्मा द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ 'पञ्चतन्त्रम्' के 'मित्रभेद' नामक तन्त्र से संकलित है। इसमें जीर्णधन नामक व्यापारी और धनिक सेठ के मध्य लोहे की तराजू और बालक के अपहरण का रोचक वृत्तांत है। यह कथा शिक्षा देती है कि "जैसे को तैसा" (शठे शाठ्यं समाचरेत्) अर्थात् कपटी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार से ही न्याय प्राप्त होता है।
प्रस्तुत पाठ विष्णु शर्मा द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ 'पञ्चतन्त्रम्' के 'मित्रभेद' नामक तन्त्र से संकलित है। इसमें जीर्णधन नामक व्यापारी और धनिक सेठ के मध्य लोहे की तराजू और बालक के अपहरण का रोचक वृत्तांत है। यह कथा शिक्षा देती है कि "जैसे को तैसा" (शठे शाठ्यं समाचरेत्) अर्थात् कपटी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार से ही न्याय प्राप्त होता है।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)—
(क) वणिग्पुत्रस्य नाम किमासीत्? (व्यापारी के पुत्र का नाम क्या था?)
उत्तरम् — जीर्णधनः
(ख) तुला कैः भक्षिता आसीत्? (तराजू किसके द्वारा खाई गई थी?)
उत्तरम् — मूषिकैः (चूहों द्वारा)
(ग) बालः केन हृतः इति जीर्णधनः अवदत्? (बालक को किसने हर लिया, जीर्णधन ने क्या कहा?)
उत्तरम् — श्येनेन (बाज द्वारा)
(घ) विवदमानौ तौ द्वावपि कुत्र गतवन्तौ? (झगड़ते हुए दोनों कहाँ गए?)
उत्तरम् — राजकुलम् / धर्माधिकरणम् (न्यायालय में)
(ङ) तुला कीदृशी आसीत्? (तराजू कैसी थी?)
उत्तरम् — लौहमयी / लौहसहस्रस्य (लोहे की)
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर)—
(क) जीर्णधनः देशान्तरं गन्तुमिच्छन् किं व्यचिन्तयत्? (जीर्णधन ने दूसरे देश जाने से पहले क्या सोचा?)
उत्तरम् — जीर्णधनः व्यचिन्तयत् यत् "यस्मिन् देशे स्ववीर्येण भोगा भुक्ताः, तस्मिन् विभवहीनो यः वसेत् स पुरुषाधमः।"
(ख) स्वतुलां याचमानं जीर्णधनं श्रेष्ठि किं प्रत्यवदत्? (अपनी तराजू माँगने पर सेठ ने क्या उत्तर दिया?)
उत्तरम् — श्रेष्ठि प्रत्यवदत् यत् "भोः! नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषिकैः भक्षिता इति।"
(ग) जीर्णधनः श्रेष्ठीसुतं कुत्र अस्थापयत्? (जीर्णधन ने सेठ के पुत्र को कहाँ छिपाया?)
उत्तरम् — जीर्णधनः श्रेष्ठीसुतं गिरिगुहायां प्रक्षिप्य तद्द्वारं बृहच्छिलया आच्छाद्य अस्थापयत्।
(घ) धर्माधिकारिणः कथं न्यायम् अकुर्वन्? (न्यायाधीशों ने न्याय कैसे किया?)
उत्तरम् — धर्माधिकारिणः सत्यं ज्ञात्वा तौ परस्परं सम्बोध्य तुला-शिशु-प्रदानेन उभौ सन्तुष्टौ अकुर्वन्।
प्रश्न 3. स्थूलपदान्याधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए)—
(क) जीर्णधनः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमैच्छत्।
प्रश्नम् — जीर्णधनः कस्मात् देशान्तरं गन्तुमैच्छत्?
(ख) श्रेष्ठिनः शिशुः स्नानोपकरणम् आदाय वणिजा सह प्रस्थितः।
प्रश्नम् — श्रेष्ठिनः शिशुः किम् आदाय वणिजा सह प्रस्थितः?
(ग) वणिक शिलया गुहाद्वारम् आच्छादितवान्।
प्रश्नम् — वणिक कया गुहाद्वारम् आच्छादितवान्?
(घ) विवदमानौ तौ राजकुलं गतौ।
प्रश्नम् — विवदमानौ तौ कुत्र / कम् गतौ?
(ङ) तोषितौ तौ तुलाशिशुप्रदानेन सन्तुष्टौ जातौ।
प्रश्नम् — तोषितौ तौ केन सन्तुष्टौ जातौ?
प्रश्न 4. अधोलिखितस्य श्लोकस्य अन्वयं भावार्थं च लिखत (श्लोक एवं भावार्थ)—
श्लोकः — "तुलां लौहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः।
राजंस्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः॥"
राजंस्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः॥"
अन्वयः — हे राजन्! यत्र लौहसहस्रस्य तुलां मूषिकाः खादन्ति, तत्र श्येनः बालकं हरेत्, अत्र संशयः न (अस्ति)।
भावार्थः — हे सभासदों! जिस नगर में एक हजार पल (भारी) लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं, वहाँ बाज भी बालक को उड़ाकर ले जा सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
भावार्थः — हे सभासदों! जिस नगर में एक हजार पल (भारी) लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं, वहाँ बाज भी बालक को उड़ाकर ले जा सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
प्रश्न 5. समस्तपदानां विग्रहं / विग्रहपदानां समासं लिखत (समास एवं विग्रह)—
| समस्तपदम् | समास-विग्रहः (समासस्य नाम) |
|---|---|
| (क) स्नानोपकरणम् | स्नानस्य उपकरणम् (षष्ठी तत्पुरुष) |
| (ख) लौहतुला | लौहस्य तुला (षष्ठी तत्पुरुष) |
| (ग) गिरिगुहायाम् | गिरेः गुहायाम् (षष्ठी तत्पुरुष) |
| (घ) धर्माधिकारिणः | धर्मस्य अधिकारिणः (षष्ठी तत्पुरुष) |
| (ङ) श्रेष्ठीसुतः | श्रेष्ठिनः सुतः (षष्ठी तत्पुरुष) |
| (च) तुलाशिशू | तुला च शिशुः च (द्वन्द्व समास) |
प्रश्न 6. प्रकृति-प्रत्यय-विभागं संयोजनं वा कुरुत (प्रकृति-प्रत्यय)—
| प्रकृति + प्रत्ययः | निष्पन्नं पदम् (शुद्ध रूप) |
|---|---|
| (क) प्र + क्षिप् + ल्यप् | प्रक्षिप्य |
| (ख) आ + च्छद् + ल्यप् | आच्छाद्य |
| (ग) वि + हस् + ल्यप् | विहस्य |
| (घ) हृ + क्त | हृतः |
| (ङ) गम् + तुमुन् | गन्तुम् |
| (च) स्ना + तुमुन् | स्नातुम् |
★ अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दवः (सन्धि एवं पर्यायपदानि) ★
1. प्रमुख सन्धि-विच्छेदः —
• तद्द्वारम् = तत् + द्वारम् (व्यञ्जन सन्धि)
• यत्नेनापि = यत्नेन + अपि (दीर्घ सन्धि)
• नास्ति = न + अस्ति (दीर्घ सन्धि)
• अत्रागतः = अत्र + आगतः (दीर्घ सन्धि)
• यत्नेनापि = यत्नेन + अपि (दीर्घ सन्धि)
• नास्ति = न + अस्ति (दीर्घ सन्धि)
• अत्रागतः = अत्र + आगतः (दीर्घ सन्धि)
2. समानार्थक-पदानि —
• श्रेष्ठि = धनिकः / वणिक
• श्येनः = पक्षिराजः / गृध्रविशेषः (बाज पक्षी)
• मूषिकाः = आखवः (चूहे)
• विभवः = धनम् / ऐश्वर्यम्
• श्येनः = पक्षिराजः / गृध्रविशेषः (बाज पक्षी)
• मूषिकाः = आखवः (चूहे)
• विभवः = धनम् / ऐश्वर्यम्
- Get link
- X
- Other Apps
Comments
Post a Comment