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दशमः पाठः — वाङ्मनःप्राणस्वरूपम्
कक्षा – नवमी (9वीं) | विषय – संस्कृतम् (शेमुषी भाग-1)
★ सम्पूर्ण अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि एवं परीक्षापयोगी नोट्स ★
📖 पाठ-सार / परिचयः
प्रस्तुत पाठ प्रसिद्ध उपनिषद् 'छान्दोग्योपनिषद्' के छठे प्रपाठक से संकलित है। इसमें श्वेतकेतु और उनके पिता महर्षि आरुणि के मध्य अत्यंत ज्ञानवर्धक संवाद है। महर्षि आरुणि दृष्टान्तों द्वारा समझाते हैं कि मन अन्नमय होता है, प्राण जलमय (आपोमय) होता है और वाणी तेजोमयी होती है। अर्थात् जैसा हम अन्न-जल ग्रहण करते हैं, वैसा ही हमारा मन, प्राण और वाणी का निर्माण होता है।
प्रस्तुत पाठ प्रसिद्ध उपनिषद् 'छान्दोग्योपनिषद्' के छठे प्रपाठक से संकलित है। इसमें श्वेतकेतु और उनके पिता महर्षि आरुणि के मध्य अत्यंत ज्ञानवर्धक संवाद है। महर्षि आरुणि दृष्टान्तों द्वारा समझाते हैं कि मन अन्नमय होता है, प्राण जलमय (आपोमय) होता है और वाणी तेजोमयी होती है। अर्थात् जैसा हम अन्न-जल ग्रहण करते हैं, वैसा ही हमारा मन, प्राण और वाणी का निर्माण होता है।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)—
(क) वाङ्मनःप्राणस्वरूपं पाठः कुतः संकलितः? (यह पाठ कहाँ से संकलित है?)
उत्तरम् — छान्दोग्योपनिषदः (छान्दोग्य उपनिषद् से)
(ख) श्वेतकेतुः कस्य समीपम् उपसद्य प्रश्नं पृच्छति? (श्वेतकेतु किसके पास जाकर प्रश्न पूछते हैं?)
उत्तरम् — आरुणेः / पितुः (महर्षि आरुणि के पास)
(ग) अशितस्य अन्नस्य योऽणिमा स किं भवति? (खाए हुए अन्न का अत्यंत सूक्ष्म भाग क्या बनता है?)
उत्तरम् — मनः (मन)
(घ) पीतानाम् अपां योऽणिमा स कः भवति? (पिए हुए जल का सूक्ष्म भाग क्या बनता है?)
उत्तरम् — प्राणः
(ङ) लीढस्य/अशितस्य तेजसो योऽणिमा सा का भवति? (तेज का सूक्ष्म भाग क्या बनता है?)
उत्तरम् — वाक् (वाणी)
(च) मथ्यमानस्य दध्नः योऽणिमा स किम् उद्गच्छति? (मथे जाते हुए दही का सूक्ष्म अंश क्या बनता है?)
उत्तरम् — सर्पिः (घृतम् / मक्खन-घी)
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर)—
(क) श्वेतकेतुः आरुणिं प्रथमं किं पृच्छति? (श्वेतकेतु ने आरुणि से पहले क्या पूछा?)
उत्तरम् — श्वेतकेतुः आरुणिं प्रथमं पृच्छति यत् "भगवन्! किं नु खलु मनः?" इति।
(ख) आरुणिः मनसः स्वरूपं कथं वर्णयति? (आरुणि ने मन का स्वरूप कैसे बताया?)
उत्तरम् — आरुणिः कथयति यत् "अशितस्य अन्नस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वं समुदीषति, तन्मनो भवति।"
(ग) प्राणस्य वाचश्च स्वरूपं किम् अस्ति? (प्राण और वाणी का स्वरूप क्या है?)
उत्तरम् — पीतानाम् अपां योऽणिमा स प्राणः, अशितस्य तेजसो योऽणिमा सा वाक् भवति।
(घ) दध्नः मथ्यमानस्य किं भवति? (दही को मथने पर क्या होता है?)
उत्तरम् — दध्नः मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वं समुदीषति, तत् सर्पिः भवति।
(ङ) पाठस्यान्ते महर्षिः आरुणिः श्वेतकेतुं किं शिक्षयति? (पाठ के अंत में आरुणि क्या सिखाते हैं?)
उत्तरम् — आरुणिः शिक्षयति यत् "अन्नमयं हि सोम्य! मनः, आपोमयः प्राणः, तेजोमयी च वाक् भवति।"
प्रश्न 3. स्थूलपदान्याधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए)—
(क) अन्नमयं मनः भवति।
प्रश्नम् — कीदृशम् मनः भवति?
(ख) दध्नः मथ्यमानस्य अणिमा ऊर्ध्वं समुदीषति।
प्रश्नम् — कस्य मथ्यमानस्य अणिमा ऊर्ध्वं समुदीषति?
(ग) श्वेतकेतुः आरुणिम् उपसद्य पृच्छति।
प्रश्नम् — श्वेतकेतुः कम् उपसद्य पृच्छति?
(घ) पीतानाम् अपां योऽणिमा स प्राणः।
प्रश्नम् — पीतानाम् अपां योऽणिमा स कः?
(ङ) श्वेतकेतुः विद्यार्थी आसीत्।
प्रश्नम् — श्वेतकेतुः कः आसीत्?
प्रश्न 4. 'क' स्तम्भे पदानि 'ख' स्तम्भे तेषां स्वरूपाणि दत्तानि, तानि योजयत (मेलनम्)—
| 'क' स्तम्भः (तत्वम्) | 'ख' स्तम्भः (स्वरूपम् / शुद्ध मेलनम्) |
|---|---|
| (क) मनः | अन्नमयम् |
| (ख) प्राणः | आपोमयः (जलमयः) |
| (ग) वाक् | तेजोमयी |
| (घ) सर्पिः (घृतम्) | दध्नः अणिमा |
प्रश्न 5. सन्धिं / सन्धि-विच्छेदं कुरुत (सन्धि एवं विच्छेद)—
| विच्छेद-पदम् | सन्धि-पदम् (शुद्ध रूप) |
|---|---|
| (क) यः + अणिमा | योऽणिमा (उत्व विसर्ग सन्धि) |
| (ख) अपाम् + अणिमा | अपामणिमा (संयोगः) |
| (ग) इति + अवधार्यताम् | इत्यवधार्यताम् (यण् सन्धि) |
| (घ) कः + अयम् | कोऽयम् (उत्व विसर्ग सन्धि) |
| (ङ) पुनः + एव | पुनरेव (ऋत्व विसर्ग सन्धि) |
| (च) यदि + एवम् | यद्येवम् (यण् सन्धि) |
प्रश्न 6. प्रकृति-प्रत्यय-विभागं संयोजनं वा कुरुत (प्रकृति-प्रत्यय)—
| प्रकृति + प्रत्ययः | निष्पन्नं पदम् (शुद्ध रूप) |
|---|---|
| (क) उप + सद् + ल्यप् | उपसद्य |
| (ख) मथ् + शानच् | मथ्यमानम् |
| (ग) पा (पी) + क्त | पीतम् |
| (घ) अश् + क्त | अशितम् |
| (ङ) वि + ज्ञा + तुमुन् | विज्ञातुम् |
| (च) अव + धृ + ण्यत्/तव्यत् | अवधार्यम् / अवधार्यताम् |
★ अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दवः (समास एवं दार्शनिक तत्त्व) ★
1. समास-विग्रहः —
• वाङ्मनःप्राणस्वरूपम् = वाक् च मनः च प्राणः च (द्वन्द्वः), तेषां स्वरूपम् (षष्ठी तत्पुरुष)
• छान्दोग्योपनिषत् = छान्दोग्या उपनिषत् (कर्मधारय समास)
• श्वेतकेतुः = श्वेतः केतुः यस्य सः (बहुव्रीहि समास)
• छान्दोग्योपनिषत् = छान्दोग्या उपनिषत् (कर्मधारय समास)
• श्वेतकेतुः = श्वेतः केतुः यस्य सः (बहुव्रीहि समास)
2. मुख्य उपदेश-वाक्यम् —
"यादृशम् अन्नं गृह्णाति तादृशी मतिः भवति।" (जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन। अतः शुद्धाचरण के लिए सात्त्विक आहार अनिवार्य है।)
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