कक्षा 8वीं से 12वीं तक की बोर्ड परीक्षाओं (MP Board / CBSE) की तैयारी कर रहे सभी विद्यार्थियों के लिए Mains Education लेकर आया है अलंकारों का सबसे आसान और सटीक वर्णन। परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रमुख अलंकारों की परिभाषा और उनके उदाहरणों का हिंदी अर्थ नीचे विस्तार से समझाया गया है, ताकि आपको रटना न पड़े और आप आसानी से पूरे अंक प्राप्त कर सकें।
1. भ्रांतिमान अलंकार
जहाँ प्रस्तुत वस्तु को देखकर किसी विशेष समानता के कारण किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाये, वहाँ भ्राँतिमान अलंकार होता है।
उदाहरण 1: जान श्याम घनश्याम को, नाच उठे वनमोर।
अर्थ: मोरों ने भगवान श्रीकृष्ण (श्याम) को देखकर उन्हें काले बादल (घनश्याम) समझ लिया और इसी भ्रम में वे प्रसन्न होकर नाचने लगे।
उदाहरण 2: चन्द के भरम होत, मोद है कुमोदिनी को।
अर्थ: किसी अत्यंत सुंदर मुख को देखकर कुमुदिनी (रात में खिलने वाला फूल) को चंद्रमा के निकल आने का भ्रम हो जाता है और वह प्रसन्न होकर खिल उठती है।
उदाहरण 3: कपिकर हृदय विचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब। जनु अशोक अंगार, दीन्ह हरषि उठि कर गहउ।
अर्थ: जब हनुमान जी ने पेड़ के ऊपर से सीता जी के पास राम जी की अंगूठी गिराई, तो सीता जी को भ्रम हुआ कि अशोक के पेड़ ने उनका दुःख देखकर कोई जलता हुआ अंगारा दे दिया है, और उन्होंने उसे प्रसन्न होकर उठा लिया।
उदाहरण 4: चाहत चकोर सूर ओर, दृग छोर करि। चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।
अर्थ: चकोर पक्षी भ्रम के कारण सूर्य को चंद्रमा समझकर उसकी ओर लगातार देख रहा है, और दूसरी तरफ चकवा पक्षी भ्रम के कारण अपना धैर्य खो रहा है।
2. सन्देह अलंकार (म.प्र. 2023)
जहाँ रूप रंग और गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चय न हो कि वह वही वस्तु है, वहाँ सन्देह अलंकार होता है। इसमें अन्त तक यह संशय बना रहता है।
उदाहरण 1: सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है। कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।
अर्थ: द्रौपदी चीरहरण के समय जब दुशासन साड़ी खींचता जा रहा था और साड़ी खत्म ही नहीं हो रही थी, तब यह संदेह उत्पन्न हो गया कि साड़ी के बीच में द्रौपदी है या द्रौपदी के बीच में साड़ी है? यह साड़ी ही नारी बन गई है या नारी ही साड़ी की बनी हुई है? (यहाँ अंत तक संशय बना रहता है)।
उदाहरण 2: दिग्दाहों से धूम उठे या जल धर उठे क्षितिज तटके।
अर्थ: दिशाओं के जलने से यह आसमान में धुआँ उठ रहा है या फिर क्षितिज के किनारे बादल उमड़ आए हैं? (धुआं है या बादल, यह निश्चय नहीं हो पा रहा है)।
अन्तर: भ्राँतिमान में एक वस्तु में दूसरी वस्तु का झूठा निश्चय हो जाता है जबकि संदेह में अनिश्चय बना रहता है कि ये है कि नहीं? तर्क-वितर्क की भावना बनी रहती है। भ्रांतिमान में हम स्वयं भ्रम दूर नहीं कर पाते, जबकि संदेह में कर लेते हैं।
3. विरोधाभास अलंकार (म.प्र. 2022)
जहाँ किसी पदार्थ, गुण या क्रिया में वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास हो, वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।
उदाहरण 1: वा मुख की मधुराई कहा कहौं, मीठी लगे अखियान लुनाई।
अर्थ: उस मुख की सुंदरता के बारे में क्या कहूँ, उसकी आँखों का खारापन (लुनाई/नमक) भी बड़ा मीठा लगता है। (खारापन मीठा लगना एक विरोधाभास है)।
उदाहरण 2: तंत्री-नाद, कवित रस, सरस राग रति रंग, अन बूड़े तिरे जे बूड़े सब अंग।।
अर्थ: वीणा के स्वर, कविता के रस और प्रेम के रंग में जो लोग पूरी तरह नहीं डूबे, वे संसार में नष्ट हो गए, लेकिन जो इनमें पूरी तरह डूब गए, वे भवसागर से पार हो गए। (जो डूब गया वो तर गया—यह विरोधाभास है)।
उदाहरण 3: या अनुरागी चित्त की गति समझे नहि कोय, ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।।
अर्थ: इस प्रेमी मन की गति कोई नहीं समझ सकता। यह मन जैसे-जैसे श्याम (काले) रंग यानी श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबता है, वैसे-वैसे और अधिक उज्ज्वल (पवित्र/सफ़ेद) होता जाता है। (काले रंग में डूबकर सफेद होना विरोधाभास है)।
4. सांगरूपक अलंकार
जिस रूपक में उपमेय के अंगों अथवा अवयवों पर उपमान के अंगों अथवा अवयवों का आरोप किया जाता है, वहाँ सांगरूपक अलंकार होता है।
उदाहरण 1: "उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग। विकसे सन्त सरोज मन, हरषे लोचन भृंग।।"
अर्थ: उदयाचल पर्वत रूपी मंच पर, श्री राम रूपी बाल सूर्य के उदय होने से, संत रूपी कमल खिल उठे और उनके नेत्र रूपी भौंरे हर्षित हो गए। (यहाँ मंच पर पर्वत, राम पर सूर्य, संतों पर कमल और नेत्रों पर भौंरों का एक साथ आरोप है)।
उदाहरण 2: "बीती विभावरी जाग री। अम्बर-पनघट में डूबो रही तारा-घट उषा-नागरी।।"
अर्थ: एक सखी दूसरी से कहती है कि रात बीत गई है, अब जाग जा। आकाश रूपी पनघट (कुएं) में, उषा (सुबह) रूपी चतुर स्त्री, तारा रूपी घड़ों को डुबो रही है अर्थात तारे छिप रहे हैं।
5. व्यतिरेक अलंकार
जहाँ उपमेय को उपमान से भी श्रेष्ठ बताया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
उदाहरण 1: "संत हृदय नवनीत समाना, कहाँ कविन पर कहै न जाना। निज परिताप द्रवै नवनीता, पर दुःख द्रवै सुसंत पुनीता।।"
अर्थ: कवियों ने कहा है कि संतों का हृदय मक्खन (नवनीत) के समान होता है, लेकिन वे सही से कह नहीं पाए। क्योंकि मक्खन तो अपने खुद के ताप (गर्मी) से पिघलता है, लेकिन पवित्र संतों का हृदय दूसरों का दुःख देखकर पिघल जाता है। (यहाँ उपमेय-संतों के हृदय को, उपमान-मक्खन से श्रेष्ठ बताया गया है)।
उदाहरण 2: "जिनके यश प्रताप के आगे। शशि मलीन रवि शीतल लागे।।"
अर्थ: राजा के यश और तेज का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि उनके यश के आगे चंद्रमा भी मलीन (फीका) लगता है और उनके प्रताप के आगे सूर्य भी ठंडा (शीतल) लगता है। (यहाँ राजा को सूर्य और चंद्रमा दोनों से श्रेष्ठ बताया गया है)।
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