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NCERT ने पायथागोरस प्रमेय का नाम बदला: अब होगा बौधायन–पायथागोरस प्रमेय
अपडेटेड: 30 दिसंबर 2025 | श्रेणी: शिक्षा, NCERT अपडेट
NCERT की नई कक्षा 8 गणित पुस्तक गणित प्रкаш में अब प्रसिद्ध पायथागोरस प्रमेय को बौधायन–पायथागोरस प्रमेय के रूप में पेश किया गया है, जिससे प्राचीन भारतीय गणितज्ञ बौधायन को औपचारिक मान्यता मिली है।
क्या है नया बदलाव?
लगभग सदियों से भारतीय छात्र इस प्रमेय को केवल पायथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ते आए हैं, लेकिन अब NCERT ने किताब में इसका नाम “बौधायन–पायथागोरस प्रमेय” लिखा है।
पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि बौधायन ने 8वीं–7वीं शताब्दी ईसा पूर्व में ही समकोण त्रिभुज से सम्बंधित इस प्रमेय को सामान्य और आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया था, जो पायथागोरस से लगभग दो शताब्दी पहले थे।
प्राचीन भारतीय गणितीय विरासत पर फोकस
पुस्तक बौधायन के शुल्ब सूत्रों का संदर्भ देती है, जिनमें वर्ग के विकर्ण के माध्यम से दो गुना क्षेत्रफल वाला नया वर्ग बनाने जैसी रचनाएँ समझाते हुए प्रमेय की अवधारणा दिखाई गई है।
किताब में (3,4,5) और (5,12,13) जैसे पूर्णांक समुच्चयों को बौधायन त्रिक या बौधायन–पायथागोरस (पायथागोरियन) त्रिक के रूप में समझाया गया है, जो (a^2 + b^2 = c^2) संबंध को संतुष्ट करते हैं।
शिक्षण पद्धति में बड़ा बदलाव
यह नई किताब NEP 2020 के अनुरूप तैयार की गई कक्षा 8 गणित श्रृंखला गणित प्रकाश का दूसरा भाग है, जिसका उद्देश्य रटने की बजाय अनुभवात्मक और संदर्भ आधारित सीखने पर जोर देना है।
प्रमेय को केवल सूत्र के रूप में नहीं, बल्कि निर्माण आधारित गतिविधियों के जरिए समझाया गया है, जैसे कि वर्ग के क्षेत्रफल को दोगुना करने की समस्या, ताकि बच्चे अवधारणा को देख और महसूस कर सकें।
भारतीय ग्रंथों से उदाहरण
अध्याय में बौधायन के अलावा भास्कराचार्य की लीलावती और कौटिल्य के अर्थशास्त्र जैसे भारतीय ग्रंथों से लिए गए उदाहरणों के माध्यम से ज्यामिति, प्रतिशत और अनुपात जैसी अवधारणाएँ जोड़ी गई हैं।
प्रतिशत और अनुपात पढ़ाते समय रोज़मर्रा के उदाहरणों जैसे इडली बैटर में चावल–उड़द दाल का अनुपात 2:1, 6:3 और 4:2 आदि से बच्चों को समानुपात की समझ दिलाई जाती है।
विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई के गणित विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एकनाथ घाते ने पुस्तक में किए गए दावों को तार्किक बताते हुए कहा कि भारत के गणित में योगदान पर गर्व होना चाहिए और अब यह पाठ्यपुस्तकों में भी दिख रहा है।
शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह के कदम छात्रों में आत्मगौरव बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें यह समझने में मदद करते हैं कि आधुनिक गणित की कई अवधारणाएँ प्राचीन भारतीय परंपरा से भी निकली हैं।
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